Wednesday, November 17, 2010

सिद्धार्थ की वापसी

सिद्धार्थ की वापसी
"कपिल अवस्तु" दूर नहीं है,
कपिल नगर के बाहर जंगल, कुछ छिदरा छिदरा लगता है!
क्या लोगों ने सूखने से पहले ही काट दिए हैं पेड़,
या शाख़ें ही जल्दी उतर जाती हैं अब इन पेड़ों की?

कपिल नगर से बाहर जाते उस कच्चे रास्ते से आख़िर कौन गया है,
रस्ता अब तक हांफ रहा है!
उस मिट्टी की तह के नीचे,
मेरे रथ के पहियों कि पुरजोर खरोचें,--
उन राहों को याद तो होंगी--

बुद्धं शरणम् गच्छामि का जाप मुसलसल जारी है,
"आनंदन" और "राघव" के होंठो पर
जो मेरे साथ चले आये हैं!
उनके होने से मन में कुछ साहस भी है--
'साहस' और 'डर' एक ही साँस के सुर हैं दोनों--
आरोही, अवरोही, जैसे चलते हैं--

और 'अना' ये मेरी कि मैं रहबर हूँ--
त्यागी भी हूँ--
राजपाट का त्याग किया है,
पत्नी और संतान के होते...
क्या ये भी एक 'अना' है मेरी?
या चेहरे पर जड़ा हुआ ये,
दो आँखों का एक तराजू--
क्या खोया, क्या पाया, तौलता रहता है--

शहर की सीमा पर आते ही, साँस के लय में फर्क आया है--
पिंजरे में एक बेचैनी ने पर फडके हैं!
जाते वक़्त ये पगडण्डी तो,
बाहर कि जानिब उठ उठ कर देखा करती थी!
लौटते वक़्त ये पाँव पकड़ के,
घर कि जानिब क्यूँ मुडती है?

मैं सिद्धार्थ था,
जब इस बरगद के नीचे चोला बदला था,
बारह साल में कितना फैल गया है घेरा इस बरगद का,
कद्द भी अब उंचा लगता है,--
"राहुल" का कद्द क्या मेरी नाभि तक होगा?
मुझ पर है तो कान भी उसके लम्बे होंगे--
माँ ने छिदवाए हों शायद--
रंग और आँखें, लगता था माँ से पायी हैं
राज कुँवर है, घोडा दौडाता होगा अब,
'यश' क्या रथ पर जाने देती होगी उसको?

बुद्धं शरणम् गच्छामि, और बुद्धं शरणम् गच्छामि--
ये जाप मुसलसल सुनते सुनते,
अब लगता है जैसे मंतर नहीं, चेतावनी है ये--
"मुक्ति राह" से बाहर आना,--
अब उतना ही मुश्किल है, जितना संसार से बाहर जाना मुश्किल था!!

क्यूँ लौटा हूँ-----?
क्या था जो मैं छोड़ गया था---
कौन सा छाज बिखेर गया था,
और बटोरने आया हूँ मैं--
उठते उठते शायद मेरी झोली से,
सम्बन्ध भरा इक थाल गिरा था--
गूँज हुई थी, लेकिन मैं ही वो आवाज़ फलाँग आया था---

हर सम्बन्ध बंधा होता है,
दोनों सिरों से,
एक सिरा तो खोल गया था,
दूसरा खुलवाना बाक़ी था--
शायद उस मन कि गिरह को खोलने लौट के आया हूँ मैं!

आगे पीछे चलते मेरे चेलों कि आवाजें कहती रहती हैं,
महसूर हो तुम, तुम कैदी हो, उस "ज्ञान मंत्र" के,
जो तुमने खुद ही प्राप्त किया है--
बुद्धं शरणम् गच्छामि-- और बुद्धं शरणम् गच्छामि!!

-गुलज़ार